स्वर्ग से वो स्वर!!

ना वो घर मेरा था, ना वो जहाँ मेरा था।
बस ज़मीन मेरी थी और आसमान मेरा था।

दहलीज़ों और मर्यादाओं ने हरपल मेरे मन को घेरा था।
पर मेरे लिए हर एक दिन नया सवेरा था।

सपने थे साजन के और खुशियाँ मेरी थी।
प्रेम का स्वप्न सजाए, वो दुनिया मेरी थी।

एक दिन एक नन्हा-सा दीपक मेरी गोद में आया था।
‘माँ बन गयी हो अब तुम’, लोगों ने मुझे खूब समझाया।

कहती क्या किससे की मेरे दिल का क्या आलम है।
एक मेरे खून का कतरा और दूजे मेरे बालम है।

गोद में तू मेरी खेला, तेरी खुशी में मैन खुद को समाया।
कभी तेरे गिर जाने पर खाना भी ना मुझको भाया।

सपना है तू मेरा, मेरे ममता की लाज रखना,
चमकना तू सितारों की तरह, मेरे सर पर लाकर ताज रखना।

होता है दुख इस बात का मुझे, हर पल ना मैं तेरे संग होंगी।
बस चलना मेरे सिखाए राहों पर तू, इस खुले आसमान में सबसे ऊँची तेरी पतंग होगी।

आँसू ना आने देना अपनी आँखों में, उन अश्कों में पानी मेरे दूध का है।
ना गिरना कभी ज़िन्दगी की रण में तू बिना लड़े, तेरी नसों में कतरा मेरे खून का है।

मैं चाहे जहाँ रहूँ, मेरा प्यार तेरे लिए अनमोल है।
जो बोएगा सो ही पाएगा, याद रखना की धरती गोल है।

A girl, a wife. A mother she is.

A feelin’, a wish. A desire she is.

Another masterpiece by my brother, Shubham Singh.

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