ममता का प्रतिबिम्ब…

मुझे वो बचपन की लोरी आज भी याद है।
टक-बक करती काठे की वो घोड़ी आज भी याद है।

भागते हुए इस जीवन की धूप में जब मैं पाषाणों पर सो जाता हूँ,
माँ तेरे आँचल की उस ठंडी बिसरियों में खो जाता हूँ।

तेरे आँचल की वो शीतलता मुझे पावन सा कर देती है,
तेरे ममता की निर्मलता मुझ में नया रुझान सा भर देती है।

तेरी सिखाई उन बातों से मैंने जीवन में चलना सीख लिया,
मीठी सी मुस्कान के बल पर हर ग़म को छलना सीख लिया।

खो जाता हूँ उन दिनों की याद में, जब मैं ना घर होता था,
याद में तेरी मानों हर पल मेरा दिल रोता था।

पर तेरा मुस्कुराता चेहरा मेरे दिल में रंग भर जाता था,
मैं ही तो हूँ माँ जो तेरे दिल में हर पल समाता था।

तेरे सिखाये गुरों से मैंने जग में नाम कमाया है।
सीख जो अपनेपन की दी तूने उससे बहुत कुछ पाया है।

आने को है वो पल बहुत जल्द जब सारे सपने तेरे पूरे हो जाएंगे,
फिर ना कोई इम्तिहान होगा, ना कोई हमें आज़माएँगे।

A poem written by my brother, Shubham Singh. Hats off brother. If you liked it, give it a big fat thumbs up and let me know how much you love your mother in the comment section below.

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29 Replies to “ममता का प्रतिबिम्ब…”

  1. Sandali mother’s love is beyond any explanations. Thousands of words r not enough to define a single word “MA”.

    BEAUTIFUL LINES WRITTEN BY SHUBHAM .All the best to him.

    Liked by 1 person

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